माघ मेला में संत समाज के साथ हुआ अन्याय | स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी पर श्रद्धालु की पीड़ा
मैं यह लेख किसी राजनीतिक लाभ या विवाद के लिए नहीं लिख रहा हूँ।
मैं यह इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि जो मैंने अपनी आँखों से वीडियो में देखा, उसने मुझे भीतर तक आहत कर दिया।
माघ मेला जैसे पवित्र आयोजन में, जहाँ सनातन परंपरा, साधु-संत और ब्राह्मण समाज की गरिमा सर्वोपरि होनी चाहिए, वहाँ स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के साथ जो हुआ, वह किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को विचलित करने वाला है।
वीडियो में स्पष्ट दिखाई देता है कि महाराज जी ने पहले से आवेदन किया था, कई बार अनुमति ली गई थी, और प्रशासन की ओर से एक पुलिस अधिकारी उन्हें एस्कॉर्ट भी कर रहा था।
वही पुलिसकर्मी उनके साथ आगे बढ़ता है, बैरिकेड पर तैनात पुलिस से बात करता है, बैरिकेड कटवाता है और यात्रा आगे बढ़ती है।
👉 मेरा प्रश्न बहुत सीधा है:
अगर अनुमति नहीं थी, तो पुलिस एस्कॉर्ट क्यों दी गई?
अगर समस्या थी, तो उसी समय क्यों नहीं बताया गया?
स्नान घाट की ओर थोड़ी ही दूरी तय करने के बाद अचानक उन्हें रोक दिया जाता है और कहा जाता है—“आपके पास परमिशन नहीं है।”
यह बात समझ से परे है।
यदि किसी कारणवश कोई प्रशासनिक समस्या थी, तो महाराज जी के पद और गरिमा का सम्मान रखते हुए, उन्हें शांति से स्नान करवा कर विषय का समाधान निकाला जा सकता था।
लेकिन इसके बजाय जो हुआ, वह अत्यंत दुखद और निंदनीय है।
उनके समर्थकों को बंदी बना लिया गया,
ब्राह्मणों की शिखा पकड़कर घसीटा गया,
उनके साथ मारपीट की गई,
और महाराज जी को अकेले कहीं दूर ले जाकर छोड़ दिया गया।
यहाँ तक कि उनकी पालकी भी तोड़ दी गई, जिस पर सवार होकर वे स्नान के लिए जा रहे थे।
यह केवल एक व्यक्ति का अपमान नहीं था—
यह संत समाज, ब्राह्मण समाज और सनातन परंपरा की मर्यादा पर आघात था।
मैं यह बात पूरे उत्तरदायित्व के साथ लिख रहा हूँ कि इस घटना की नैतिक जिम्मेदारी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी पर भी आती है।
राज्य में यदि संत सुरक्षित नहीं हैं,
यदि धार्मिक आयोजनों में गरिमा सुरक्षित नहीं है,
तो सरकार को स्पष्टीकरण देना चाहिए।
यह लेख किसी के विरुद्ध घृणा नहीं फैलाता,
यह न्याय, सम्मान और उत्तरदायित्व की माँग करता है।
एक श्रद्धालु के रूप में,
एक नागरिक के रूप में,
और भक्तराज परिवार के माध्यम से
मैं यही अपेक्षा करता हूँ कि—
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इस घटना की निष्पक्ष जाँच हो
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दोषी चाहे कोई भी हो, उस पर कार्रवाई हो
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भविष्य में किसी भी संत या श्रद्धालु के साथ ऐसा अपमान न हो
माघ मेला आस्था का उत्सव है,
और आस्था डंडे से नहीं, सम्मान से चलती है।
— एक आहत श्रद्धालु
(भक्तराज अजय शुक्ल )