श्री जोतराम भगवान की जीवन कथा
श्री गुरु भभूता सिद्ध देश पित्तर बाबा जोतराम जी महाराज — जीवन चरित्र, इतिहास एवं चमत्कार
राजस्थान के चूरू जिले के भनीण गाँव में जन्मे श्री बाबा जोतराम जी महाराज केवल एक संत ही नहीं, बल्कि परमार्थ, सेवा, त्याग और अध्यात्म के उज्ज्वल स्तम्भ बने।
उनके जीवन का प्रत्येक प्रसंग भक्ति, करुणा और परम अध्यात्मिक ऊँचाइयों से भरा मिलता है।

जन्म एवं परिवारिक परिचय
- जन्म स्थान: भनीण गाँव, तहसील तारानगर, जिला चूरू (राजस्थान)
- पिता: चौधरी सुल्तानराम गोदारा
- माता: माता कस्तूरी देवी
- भाई: झाबरराम, लाधुराम, हरदयाल
- बहनें: नंदकौर, सजना, झड़िया, सोना
बचपन से ही जोतराम जी का स्वभाव शांत, सरल और संतवृत्ति वाले थे।
ईश्वर भक्ति और धार्मिक संस्कार उन्हें बचपन से ही प्राप्त थे।
भक्ति की ओर पहला कदम
बचपन में उनकी आँखों में दर्द हुआ, उसी समय से वे
राम भक्ति व सत्संग में अधिक समय देने लगे।
मुख्य कार्य खेती-बाड़ी और पशुपालन था,
परंतु वन-विहार, ध्यान और भक्ति उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया।
विवाह एवं गृहस्थ जीवन
18 वर्ष की आयु में विवाह राजकौर सिहाग (गाँव बिल्यू बिगोरा, सरदारशहर) से हुआ।
उनसे दो पुत्र हुए:
- हरी सिंह
- रामस्वरूप
ज्योताराम जी ने 8 वर्ष तक गृहस्थ धर्म निभाया,
परंतु धीरे-धीरे उनका मन संसार से अलिप्त होने लगा।
गुरु भभूता सिद्ध महाराज से दिव्य मिलन
एक दिन जंगल में पशु चराते समय
उनकी भेंट गुरु भभूता सिद्ध महाराज से हुई,
जो उस समय सुक्ष्म शरीर में विचरण कर रहे थे।
जोतराम जी को देखकर उन्होंने स्थूल शरीर धारण किया
और उन्हें अपने समीप बुलाया।
यही क्षण उनके जीवन का महान आध्यात्मिक मोड़ था।
गुरु महाराज से मिलते ही जोतराम जी ने
उनके प्रति पूर्ण समर्पण और शिष्यत्व स्वीकार करने की इच्छा व्यक्त की।
गुरु भभूता सिद्ध महाराज ने उन्हें विधिवत दीक्षा प्रदान की
और कहा:
“तू मेरे परमार्थिक कार्यों में सहायक सिद्ध होगा।”
यह वचन उनके जीवन की दिशा बदलने वाला सिद्ध हुआ।
वैराग्य, सेवा और परोपकार की भावना
गुरु सेवा में जुड़ते ही
जोताराम जी में वैराग्य, त्याग और दीन-दुखियों की सेवा की प्रबल भावना जागी।
वे गुरु से बोले:
“गुरुदेव, संसार दुखी है। आपकी आज्ञा हो तो मैं दुखियों का दुख दूर करना चाहता हूँ।”
इस पर गुरु भभूता सिद्ध जी ने कहा:
“यह घोर कलयुग है। इसके लिए तुम्हें यह पंचतत्व का शरीर छोड़ना पड़ेगा।”
जोताराम जी ने उत्तर दिया—
“हे गुरु देव, परमार्थ के लिए मैं हजार शरीर छोड़ने को भी तैयार हूँ।”
गुरु जी यह सुन कर प्रसन्न हुए और उन्हें दिव्य आशीर्वाद दिया—
“तेरा नाम चारों कुण्टों में अमर होगा।”
देह त्याग का अलौकिक प्रसंग
भादवा की दशमी (शनिवार)
सुबह 10 बजे पीवणा द्वारा (साँप की छाती पर बैठकर प्राण त्याग)
जोताराम जी ने अपना नश्वर शरीर त्याग दिया।
यह घटना गांव भर के लिए अविश्वसनीय और अद्भुत थी।
देह त्याग करने के बाद
उनकी आत्मा अपनी बहन सजना के घर पहुँची और
उसे साक्षात् दर्शन देकर परचा दिया।
बहन सजना जब भनीण पहुँची
तो अपने भाई का पार्थिव शरीर देखकर फूट-फूटकर रो पड़ी।
यह घटना आज भी गांव में श्रद्धा और आश्चर्य का विषय है।
ज्योति का गुरु ज्योति में लीन होना
देह त्याग के बाद
जोताराम जी की ज्योति
गुरु भभूता सिद्ध महाराज की ज्योति में लीन हो गई।
इसके बाद 1 वर्ष बीतने पर
उन्होंने कई घरों के मुख से बोलकर
अनेक चमत्कार प्रकट किए,
जिससे लोगों में उनके प्रति गहरी आस्था उत्पन्न हुई।
चमत्कार और महिमा
- दूल्हाराम जी के मुख बोले
- बाद में बुद्धराम गोदारा, चंद्रों, सावित्री, गुगनराम आदि के मुख से भी बोले
- अनेक अद्भुत चमत्कार दिखाए
- गांव में हर घर में उनका स्थान स्थापित हुआ
भनीण गाँव का मुख्य मंदिर
आज भी बाबा जोतराम जी की महिमा का प्रतीक है जहाँ
चैत्र सुदी दशमी और भादो दशमी पर विशाल मेलें लगते हैं।
नाम को चारों कुण्टों में अमर करने का वचन
ग्यारह वर्ष बीतने के बाद
जोताराम जी ने गुरु भभूता सिद्ध से कहा—
“गुरुदेव, मैंने अपना वचन निभाया। अब आप मेरा वचन पूर्ण करें।”
तब गुरु उन्हें लेकर कैलाश पर्वत पहुँचे
जहाँ भगवान शिव समाधि में थे।
शिवजी ने नेत्र खोलकर कहा:
“सिद्ध का वचन सिद्ध होता है। इसका नाम चारों कुण्टों में अमर होगा—
परंतु यह तभी होगा जब यह किसी अछूत (नीची जात) के मुख बोलेगा।”
जोताराम जी ने यह शर्त तुरंत स्वीकार कर ली।
साथ ही प्रार्थना की—
“मुझे आशीर्वाद दीजिए कि संसार का कोई तांत्रिक, अघोरी, जादूगर
मुझे अपने वश में न कर सके।”
भगवान शिव ने कहा—
“तथास्तु!”
लोक कल्याण का आदेश
भगवान शिव ने उन्हें आदेश दिया—
“भभूती देकर दुखियों के दुख दूर करो।
कोई प्रेत, जिन्द, जादू-टोना तुम पर प्रभाव नहीं डाल सकेगा।”
इसके बाद जोतराम जी ने
अनगिनत भक्तों के कष्ट हरने शुरू कर दिए
और उनका नाम देश भर में प्रसिद्ध हो गया।
आज की भक्ति और मान्यता
आज जोतराम जी महाराज
सैकड़ों गांवों और हजारों परिवारों के आस्था, भक्ति और शक्ति के देवता हैं।
- भभूती का प्रसाद
- परचे
- चमत्कार
- संकट हरना
- रोग-निवारण
- और दुष्ट शक्तियों का नाश
उनकी महिमा का हिस्सा माना जाता है।
भक्त श्रद्धा से कहते हैं—
“बाबा जोतराम जी की जय!”